नेपाल हिंसा में को लेकर अलर्ट: नेपाल में राजशाही के लिए हो सकता है हिंसक प्रदर्शन, विद्रोही संगठन ने सरकार को दिया अल्टीमेटम, हाई अलर्ट पर सेना

- नेपाल में राजशाही के लिए हो सकता है हिंसक प्रदर्शन
- विद्रोही संगठन ने सरकार को दिया अल्टीमेटम
- चार पार्टी गठबंधन ने लोकतंत्र का किया समर्थन
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। नेपाल में राजशाही की मांग के लिए आंदोलन तेज होता दिखाई दे रहा है। राजशाही का समर्थन करने वाले संगठनों ने नेपाल सरकार को अब एक हफ्ते का अल्टीमेटम दिया है। साथ ही, कहा है कि अगर हफ्ते में मामला नहीं सुलझता है तो वे आंदोलन को और ज्यादा तेज करेंगे।
संगठन के प्रवक्ता नाबराज सुबेदी ने कहा है कि उन्होंने सभी लोकतांत्रिक पार्टियों और सरकार को एक सप्ताह का समय दिया है। उन्होंने कहा है कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा है। लेकिन उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन को तेज करेंगे और लक्ष्य हासिल करके रहेंगे।
संगठन के प्रवक्ता नाबराज सुबेदी ने आगे कहा कि सरकार को 1991 वाला संविधान लागू करना चाहिए। देश में संवैधानिक राजशाही होनी चाहिए। जिसमें मल्टी पार्टी सिस्टम और संसदीय लोकतंत्र को भी जगह दी गई है। उनका कहना है कि नेपाल को हिंदू राष्ट्र होना चाहिए। उनकी सरकार से मांग है कि मौजूदा संविधान में जरूरी संशोधन करके पुराने कानूनों को लागू करना चाहिए।
चार पार्टी गठबंधन ने लोकतंत्र का किया समर्थन
इधर, शुक्रवार के दिन चार पार्टियों के गठबंधन ने लोकतंत्र का समर्थन किया है। उन्होंने कहा है कि नेपाल के लोगों ने लोकतंत्र के लिए संघर्ष किया है। जिसे खत्म होने नहीं दिया जा सकता है। राजधानी काठमांडू में तनावपूर्ण माहौल देखने को मिल सकता है। हालात को देखते हुए राजधानी में 5 हजार जवानों को तैनात किया गया है। एजेंसियों ने भी काठमांडू में हिंसक झड़पों की आशंका जताई है। पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र शाह के समर्थकों ने भी 11 अप्रैल से आंदोलन को तेज करने का ऐलान किया है। वहीं, नेपाल के शीर्ष नेताओं का कहना है कि अब नेपाल में राजशाही की वापसी नामुमकिन है।
नेपाल करीब 240 सालों तक था हिंदू राष्ट्र
बता दें कि, नेपाल करीब 240 सालों तक हिंदू राष्ट्र था। यहां राजशाही चलती थी। साल 2001 में राजा वीरेंद्र विक्रम शाह की परिवार सहित हत्या कर दी है। इसके बाद फिर उनके भाई ज्ञानेंद्र शाह राजा बन गए थे। वहीं, चीन समर्थक कम्युनिस्ट पार्टी ने साल 2006 में राजशाही को खत्म कर दिया। नेपाल कम्युनिस्टों का शासन हो गया। पुष्प कमल दल प्रचंड ने राजतंत्र के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध तक चला दिया था।
उग्र हो रहा प्रदर्शन
नेपाल ने 2008 में संसदीय घोषणा के जरिए 240 साल पुरानी राजशाही को खत्म कर दिया था। इससे देश राज्य एक धर्मनिरपेक्ष, संघीय, लोकतांत्रिक गणराज्य में बदल गया। 19 फरवरी को लोकतंत्र दिवस पर प्रसारित एक वीडियो संदेश में पूर्व राजा ज्ञानेंद्र की ओर से जनता से समर्थन की अपील के बाद राजशाही की बहाली की मांग फिर से उठने लगी । इस महीने की शुरुआत में जब ज्ञानेंद्र देश के विभिन्न हिस्सों में धार्मिक स्थलों का दौरा करने के बाद त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरे, तो कई राजशाही समर्थक कार्यकर्ताओं ने उनके समर्थन में एक रैली निकाली। प्रदर्शनकारियों को 'राजा वापस आओ, देश बचाओ', 'हमें राजशाही चाहिए', और 'राजा के लिए शाही महल खाली करो' जैसे नारे लगाते हुए सुना गया।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नेपाल में राजशाही के पक्ष में इस भावना के पीछे एक प्रमुख कारण व्यापक भ्रष्टाचार और आर्थिक गिरावट से जनता की हताशा है। इसकी एक वजह शासन की स्थिरिता भी है। राजा को कभी शक्ति और स्थिरता के प्रतीक के रूप में देखा जाता था, नेपाल ने 2008 में गणतंत्र में परिवर्तन के बाद से उस स्थिरता को बनाए रखने के लिए संघर्ष किया है। पिछले 16 वर्षों में, देश ने 13 अलग-अलग सरकारें देखी हैं।
Created On :   28 March 2025 6:15 PM IST