danik bhaskar
Wednesday, 18 January, 2017
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भोपाल: 2015 में पूरे वर्ष मध्यप्रदेश विभिन्न कारणों से राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में बना रहा है। इसमें बड़ी संख्या हादसों की रही है। इटारसी में ट्रेन के सिग्नल सिस्टम में लगी आग ने इस साल भारतीय रेल तंत्र को लगभग 100 साल पीछे पहुंचाते हुए रेलवे की इस आपदा को इतिहास में दर्ज करा दिया। दूसरी ओर इंदौर में एक ही मरीज के दो अंगों को अलग-अलग मरीजों को लगाने के लिए देश में पहली बार एक साथ 2 ग्रीन कॉरिडोर बनाए गए। लगभग 2 साल पहले सामने आये व्यापमं घोटाले की गूंज इस साल कथित तौर पर घोटाले से जुड़ी कई मौतों के बाद देश की संसद तक सुनाई दी। घोटाले को कवर करने दिल्ली से झाबुआ आए आज तक के टीवी चैनल पत्रकार अक्षय कुमार की 4 जुलाई को संदिग्ध परिस्थितियोें में हुई मौत ने एक बार फिर व्यापम घोटाले को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया।

इसके दो ही दिन बाद 6 जुलाई को जबलपुर के नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ अरूण शर्मा दिल्ली के एक होटल के कमरे में मृत पाए गए। डॉ. शर्मा ने अपनी मौत के कुछ ही दिन पहले कथित तौर पर घोटाले से जुडी एक रिपोर्ट मामले की जांच कर रहे विशेष कार्य बल(STF) को सौंपी थी। व्यापमं मामले ने जहां प्रदेश सरकार को आरोपों के घेरे में बनाए रखा, वहीं बड़वानी में प्रशासन की लापरवाही ने बहुत से लोगों की आंखों की रोशनी छीन ली। साल के अंत में दिसंबर महीने में बड़वानी के सरकारी अस्पताल में मोतियाबिंद शिविर में ऑपरेशन के बाद लगभग 40 से भी ज्यादा लोगों को अपनी आंखों की रोशनी गंवानी पड़ी थी। पीड़ितों की जांच के लिए नई दिल्ली से आए एम्स के विशेषज्ञों ने भी अपने स्तर पर कोशिशें कीं, लेकिन कथित तौर पर संक्रमित दवाइयों और पुराने उपकरणों के कारण हुए इस हादसे के शिकार लोगों की जिंदगी दोबारा रोशन नहीं हो सकी। मामले में ऑपरेशन करने वाले सर्जन को निलंबित करने के बाद जांच अभी तक जारी है।

वहीं सितंबर महीने की 12 तारीख को झाबुआ के पेटलावद में रिहाइशी इलाके में एक गोदाम में रखी जिलेटिन छड़ों में हुए लगातार 2 विस्फोटों में कम से कम 85 लोगों की मौत हो गई। विस्फोट के मुख्य आरोपी राजेंद्र कांसवा की भी पिछले दिनों डीएनए जांच में विस्फोट में ही मारे जाने की खबरें आई हैं। हालांकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस अब भी कांसवा को फरार बताते हुए सरकार के दावों को नकार रहा है। इसके पहले 17 जून को इटारसी जंक्शन के रूट रिले इंटरलॉकिंग सिस्टम में लगी आग ने देश भर के रेल तंत्र को ध्वस्त कर दिया। आग लगने से लगभग दो महीने तक सभी दिशाओं की ट्रेनें प्रभावित रहीं। एक आंकलन के मुताबिक अग्निकांड के बाद देश भर में लगभग 3200 ट्रेन सेवाएं निरस्त हुईं हैं। इस दौरान लाखों यात्रियों को परेशानी का सामना करना पडा। नया सिस्टम स्थापित होने और उसके परीक्षण में रेलवे को लगभग दो महीने का समय लगा। ट्रेनों से जुडा ही एक और हादसा हरदा जिले में 5 अगस्त को हुआ। हरदा के पास एक छोटे पुल पर अचानक बाढ का पानी आने से मुंबई से वाराणसी जा रही कामायनी एक्सप्रेस और पटना से मुंबई जा रही जनता एक्सप्रेस कुछ मिनटों के अंतराल में पटरी से उतर गईं। आधी रात को हुए इस हादसे में लगभग 40 से भी ज्यादा लोगों की मौत हुई। पन्ना जिले में मई में छतरपुर से सतना जा रही एक बस के एक मोड पर नाले में गिरने से बस में आग लग गई। बस में एक ही दरवाजा था, जो नीचे की तरफ दब गया और यात्री बाहर नहीं निकल सके। इस दर्दनाक हादसे में बस में सवार लगभग 30 लोग जिंदा जल गए।

 

वहीं होशंगाबाद जिले में दिसंबर में हुए एक हादसे ने घर में हुई शादी की खुशियां मना रहे एक परिवार की खुशियां छीन लीं। अपनी बेटी की शादी के बाद रिसेप्शन के लिए छिंदवाडा से इंदौर जा रहे एक परिवार की बस होशंगाबाद जिले में पुल पर से नदी में गिर गई, जिससे बस में सवार एक ही परिवार के 15 लोगों की मौत हो गई। प्रदेश का इंदौर इस बार मानवीय कारणों से खासा चर्चा में रहा। कभी न थमने वाला इंदौर इस साल दो बार दो ब्रेनडैड मरीजों के अंग अन्य जरूरतमंदों को पहुंचाने के लिए पूरी तरह थम गया। इंदौर में पहले 7 अक्टूबर को रामेश्वर खेडे नाम के मरीज का लिवर गुडगांव पहुंचाया गया और दूसरी बार रमेश असरानी नामक मरीज के लिवर और किडनी गुडगांव और इंदौर के ही एक अन्य अस्पताल में पहुंचाने के लिए 2 ग्रीन कॉरिडोर बनाए गए। इस दौरान इंदौर के बाशिंदों ने पूरी तरह से जरूरतमंदों को अंग पहुंचाने में मदद की।

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