danik bhaskar
Monday, 23 January, 2017
Updated

रायपुर : छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह ने आज कहा कि नागरिक आपूर्ति निगम (नान) घोटाला मामले में भारतीय प्रशासनिक सेवा के दो अधिकारियों आलोक शुक्ला एवं अनिल टुटेजा के खिलाफ केन्द्र से अभियोजन चलाने की अनुमति नही मिली है,जिसके कारण सक्षम न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए मामला लम्बित है। डा.सिंह ने आज कांग्रेस के भूपेश बघेल के प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।उन्होने कहा कि दोनो के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रकरण राज्य आर्थिक अपराध अनवेषण ब्यूरों में गत 12 फरवरी को दर्ज किए गए थे। उन्होने बताया कि दोनो अधिकारियों के विरूद्ध अभियोजन स्वीकृति प्राप्त करने के लिए प्रकरण 18 जुलाई को केन्द्र सरकार को प्रेषित किया गया था। 

आखिर क्या है यह घोटाला
आज उस सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस सिस्टम) की सच्चाई भी आपको बताएंगे जिसको लेकर राज्य सरकार ने अपनी पीठ थपथपाई थी. छत्तीसगढ़ के इस घोटाले में चपरासी से लेकर मुख्यमंत्री और उनके परिवार तक का नाम सामने आ रहा है.  क्या है उस कथित डायरी का राज जिसके सामने आने के बाद बीजेपी के एक और मुख्यमंत्री सवालों के घेरे में आ गए हैं. और ये भी बताएँगे की क्यों उठ रहे हैं इस घोटाले को उजागर करने वाली एजेंसी एंटी करप्सन के ऊपर सवाल. घोटाला समझाने ने से पहले आपको बता दें की चावल कैसे बनता है और कैसे जनता तक पहुँचता है. सरकार द्वारा घोषित मिनिमम सपोर्ट प्राइस पर सरकारी एजेंसी मार्केटिंग फेडरेशन किसानों से धान खरीदती है.  ये धान फिर मिलर मार्केटिंग फेडरेशन से लेता है प्रोसेस करने के लिए यानि चावल बनाने के लिए.
इस घोटाले के चार मुख्य सूत्रधार है और चार स्तरों में ही होता है भ्रष्टाचार-
1. मार्क फेड यानि मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ़ इंडिया
2. नान यानि नागरिक आपूर्ति निगम
3. पीडीएस चावल का वितरण करनेवाले दुकानदार या ठेकेदार
4. राइस मिलर

 

नागरिक आपूर्ति निगम (नान का भ्रष्टाचार)

नान को मोटी रकम मिलती है राइस मिलर से. राइस मिलर को चावल प्रोसेस करके नान के गोडाउन में जमा करना होता है. नान के गोडाउन से ये चावल राशन के दुकानों या पीडीएस के ठेकेदारों तक और वहां से लोगों तक पहुँचता है. नान के अधिकारी, राइस मिलर और पीडीएस के दुकानदार और ठकेदार आपसी सहमति से एक रास्ता निकालते है. राइस मिलर चावल को नान के गोडाउन में पहुँचाने के बजाय सीधा दुकानों तक पहुंचाता है जिससे ट्रांसपोर्टेशन का खर्च बचता है और ट्रांसपोर्टेशन के पैसे नान अधिकारी सरकार से लेकर अपनी जेब में डाल लेते हैं.वहीँ राइस मिलर राशन के दुकानदारों के साथ मिलकर कालाबाज़ारी करते है. अगर एक दुकान में 100 किलो चावल पहुँचाना है तो राइस मिलेर सिर्फ 50 किलो पहुंचता है. वहीँ दुकानदार 50 किलो लोगों में बांटता है और फ़र्ज़ी राशन कार्ड का इस्तेमाल कर अन्य 50 किलो की फ़र्ज़ी एंट्री करता है. यानी जनता में बांटे जाते है सिर्फ 50 किलो लेकिन सरकार को दिखाया जाता है 100 किलो वितरण का ब्यौरा. राइस मिलर इस 50 किलो के ऐवज में दुकानदार, ठेकेदार को रकम देता है और चावल अपने पास ही रख लेता है. नान के अधिकारी पीडीएस के इन दुकानदारों से भी पैसे लेते है. इसके अलावा नान के अधिकारी ट्रांसपोर्टेशन के दौरान चावल की बोरियां गिर गई ऐसा बताकर क्विंटल के क्विंटल गायब कर देते है.

इसके अलावा प्रबंध संचालक के जरिये ट्रांस्पोर्टस को परिवहन का  ठेका दिया जाता था और गोदामों से अनावस्यक चावल का मूमेंट करवाकर गोदामों में जगह बनाकर क्षेत्र विशेष के राइस मिलर को फायदा पहुँचाया जाता था.  और इसके एवज  में  राइस मिलर से  भारी मात्रा में वसूली की जाती थी. एसीबी चार्जशीट के मुताबिक नान के अधिकारी राइस मिलर से 4 रु प्रति क्विंटल से रकम वसूलते है.  जबकि राशन के दुकानदार ठेकेदारों से 2 रुपये प्रति क्विंटल. इन सब रास्तों से कमाए गयी रकम का एक बड़ा हिस्सा सरकार को नान की तरफ से जाता है.

गोडाउन में कमीशन

सरकार के पास धान और चावल रखने के लिए पर्याप्त गोडाउन नहीं होते है. ऐसे में मार्क फेड और नान धान और चावल को रखने के लिए गोडाउन किराये पर लेते है. हर गोडाउन मालिक से नान और मार्क फेड के अधिकारी कॉन्ट्रैक्ट का 7 % कमीशन लेते है

danik bhaskar